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Showing posts from October, 2020

बिहार ग्राम रक्षा दल

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ग्राम रक्षा दल स्वार्थहीन करते है काम, मगर कोई पहचान नहीं है। मिले हमें भी अपना हक,  दिखता ऐसा अहसान नहीं है। हमें जब से जोड़ा गया है,  रिश्ते भी कितने तोड़ा गया है। जोड़ नूतन रिश्तों की आस में- अपनों से भी मुँह मोड़ा गया है। उषा काल सुबह का हो या, पहर चौथी ही क्यों न बीते। विधि व्यवस्था के संधारन हो या कहर कोरोना क्यों न बीते। हम भी सुरक्षा के अंग है, ये बात किसी को न सुझे। अवाज हमारी सत्ता तक पहुँचे,  हमें भी भुखमरी से बचा ले।  सुरक्षा की इस श्रृंखला में, हमें भी तो अब सजा ले। न्याय उचित कर कुछ तो कर दे, अपना समझकर साथ रख ले। बिन हमारी कुछ तो फर्क पड़ेगा? मान लो वर्ना हटाकर देख ले। श्रवण कुमार पंडित(टेढ़ागाछ,बिहार )

हाइकु :आशा

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हाइकु :आशा    (1) प्रयास कर  पर्वत वृक्ष बिन फल मिलेगा   ( 2) वक्त आयेगा  नदी नीर विहीन  समुन्द्र बन   ( 3) सीचते चले  उर वह्नि चलेगा  भू घास भरा     (4) भाव जगाके  दरार परे रिश्ते  बाग खिलेगी    (5) प्रयत्न  जारी  किस्मत टूटी हुई  लक्ष्य मिलेगी    ( 6) बदलाव से   पानी है खारा हुआ  जिन्दा रहेंगे    ( 7) भरोसा बना  निराशा का माहौल  दीप जलेगा   श्रवण कुमार पंडित (टेढ़ागाछ, बिहार)

स्मृतिशेष विश्वनाथ दास "देहाती"

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सच्ची श्रद्धांजलि (स्मृतिशेष देहाती जी ) पथ पे चलना सिखा दिये वो,  पर मंजिल  मिलनी बाकी है।  जन चेतना को जगा गये वो,  चिंता  साहित्य बचाने की है।  रेणु  के थे वो  समकालीन,  हो गये पंचतत्व में विलीन।  समाज  के  कुरूतियों पर,  रच  दिये थे वो "भिखारिन'।  हमें प्रेरणा मिलती रहेगी सदा,  पथ  पर चलेंगे, डरेंगे न ज़रा।   रेणु  के  थे वास्तविक  वंशज,  इतनी  सी बात तो जान ज़रा।  युवाओं को उत्साहित करता,   वो  नाती,अतुल 'अनजान'है।  कोशी को साहित्य जगत में,  दिलानी  और भी पहचान है।  उनके साहित्य को पढ़कर,  करले हम सब आत्मसात।  यही सच्ची श्रद्धांजलि होंगी  दिल कहता अब बारम्बार। श्रवण कुमार पंडित (टेढ़ागाछ, बिहार )

सामाजिक पुनर्जागरण के पुरोधा :ईश्वरचंद्र विद्यासागर

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सामाजिक पुनर्जागरण के पुरोधा : ईश्वर चंद्र विद्यासागर       भारतीय पुनर्जागरण के आधार स्तंभों में से एक स्तंभ थे  ईश्वर चंद्र विद्यासागर। वे 19 वी सदी के महान समाज सुधारक, शिक्षाविद तथा प्रसिद्ध साहित्यकार थे।"अपने हीत से पहले समाज और देश के हीत को देखना एक विवेक युक्त सच्चे नागरिक का धर्म होता है "यही विचार उनके आदर्श थे। उनके चिंतन के केंद्र में शिक्षा एंव स्त्रियों की दशा मौजूद थे। वे पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के अवाज थे। वे सामाजिक एंव धार्मिक सुधार आंदोलन के महान अग्रदूत राजा राम मोहन राय तथा दयानन्द सरस्वती के समकालीन थे।  जीवन परिचय      ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में 26 सितम्बर 1820 में  वीरसिंह गाँव, मेदनीपुर (पश्चिम बंगाल ) में  हुआ था। उनकी माता भगवती देवी, पिता ठाकुरदास बांधोपाध्याय, पत्नी दिनामनी देवी तथा एक मात्र पुत्र नारायण चंद्र बांधोपाध्यक्ष था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव से पुरी  कर 9 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आया था। वे इतने ...

राष्ट्र प्रेम

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राष्ट्र प्रेम  वीरों की यह भूमि जानें,  जानें वीर जवान को।  राष्ट्रहित में कुर्बानी जानें,  जानें सपूत महान को।  गोरों की क्रूर नीति जानें,  जानें उनके विधान को।  आगे बढ़ाया सत्ता जानें,  जानें ले गये निधान को।  वीरों के हुंकार को जानें,  जानें उनके तलवार को।  कूदे वे मातृभूमि में जानें,  जानें उनके तकरार को।  गाँधी के आंदोलन  जानें,  जानें लाल,बाल,पाल को।   सुभाष के देशभक्ति जानें,  जानें क्रांति के मशाल को।   राष्ट्रप्रेम की भावना जागे,  भूले न हम बलिदान को।  विश्व गुरु अब तो बनाये,  मिलकर  हिंदुस्तान  को। श्रवण कुमार पंडित (टेढ़ागाछ,बिहार )

एक समर अभी है शेष।

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एक समर अभी है शेष।               (1)            शहीद हुए वीरों के ,  शौर्य मान अभी है शेष।  तरकश में शर कस चुका, वार अभी है शेष।  धधकती,बिलखती रोष, पर सत्ता है मदहोश।  एक समर हो  चुका, एक समर अभी है शेष।                  (2)         आहत हुआ विश्व है, आना अमन अभी है शेष।  इंसान में इंसानियत  की परख अभी है शेष।  व्याध होके घुमते लोग, रखते  है हैवानियत।  एक समर हो चुका, एक समर अभी है शेष।                  (3)        सत्ता हीन हो चुकी, मुखौटों में रखें है भेष।  राते तो कट चुकी, सहर होना अभी है शेष।  भूखें को रोटी न मिलती नेता के सजे है मेज- एक समर हो चुका,  एक समर अभी है शेष।                    (4)       आजादी मिल चुकी, आजाद होनी अभी है शेष।...

अपने अंतर्मन को जगाओ

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अपने अंतर्मन को जगाओ। नारी अस्मिता वापस लाओ,  तब सच्चा मानव कहलाओ।  कब-तक आँखे बंद रखेंगे - चलो अब तो अवाज उठाओ।  अपने अंतर्मन को जगाओ।।                               जगत जननी जग में लाओ,                             फिर उसे अधिकार दिलाओ।                            भेद-भाव करने ना दो उनसे -                           चलो उन्हें भी शिक्षा दिलाओ।                             अपने अंतर्मन को जगाओ।।   बँधी बेड़ी अब तोड़ हटाओ,  स्वतंत्र उसे चलना सिखाओ।   बने जो भी इसमें रूकावट- मिलकर चोट उनको लगाओ। अपने अंतर्मन को जगाओ।।                  ...

महात्मा गाँधी पर कविता

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महात्मा गाँधी  नमन  हमारे राष्ट्र पिता को,    नमन है उनके विचारों का।   शांति व स्वछता के दूत वो,  मार्ग अहिंसा पे चलने वाले।  स्वराज्य का सपना जिनके,    सर्वोदय समाज गढ़ने वाले। दलितों के उद्धारक बनकर, रंग-भेद मिटाया चेहरों का।  नमन हमारे  राष्ट्र पिता को,     नमन है उनके विचारों का।  कई आंदोलन चलाने वाले,  राष्ट्रहित में थे सोचने वाले। अस्पृश्यता को कोढ़ माना,  न्याय सबको दिलाने वाले।  वर्षो किये राज यहाँ गैरों ने,  वही राज  हटाया गौरों का।  नमन हमारे राष्ट्र  पिता को,   नमन है उनके विचारों का।  एक  सूत्र  में  जोड़ने  वाले,  एकता का पाठ पढ़ाने वाले।  किसानों  के  समस्या  जाने,  वही है चम्पारण आने वाले।  जलते नोआखली में गाँधी ने, निकाला समाधान दंगों का।   नमन  हमारे  राष्ट्र  पिता को, नमन है  उनके  विचारों का। वर्ण व्यवस्था को ठीक माने,  ऊँच-नीच मिटाने...