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स्मृतिशेष विश्वनाथ दास "देहाती"

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सच्ची श्रद्धांजलि (स्मृतिशेष देहाती जी ) पथ पे चलना सिखा दिये वो,  पर मंजिल  मिलनी बाकी है।  जन चेतना को जगा गये वो,  चिंता  साहित्य बचाने की है।  रेणु  के थे वो  समकालीन,  हो गये पंचतत्व में विलीन।  समाज  के  कुरूतियों पर,  रच  दिये थे वो "भिखारिन'।  हमें प्रेरणा मिलती रहेगी सदा,  पथ  पर चलेंगे, डरेंगे न ज़रा।   रेणु  के  थे वास्तविक  वंशज,  इतनी  सी बात तो जान ज़रा।  युवाओं को उत्साहित करता,   वो  नाती,अतुल 'अनजान'है।  कोशी को साहित्य जगत में,  दिलानी  और भी पहचान है।  उनके साहित्य को पढ़कर,  करले हम सब आत्मसात।  यही सच्ची श्रद्धांजलि होंगी  दिल कहता अब बारम्बार। श्रवण कुमार पंडित (टेढ़ागाछ, बिहार )

सामाजिक पुनर्जागरण के पुरोधा :ईश्वरचंद्र विद्यासागर

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सामाजिक पुनर्जागरण के पुरोधा : ईश्वर चंद्र विद्यासागर       भारतीय पुनर्जागरण के आधार स्तंभों में से एक स्तंभ थे  ईश्वर चंद्र विद्यासागर। वे 19 वी सदी के महान समाज सुधारक, शिक्षाविद तथा प्रसिद्ध साहित्यकार थे।"अपने हीत से पहले समाज और देश के हीत को देखना एक विवेक युक्त सच्चे नागरिक का धर्म होता है "यही विचार उनके आदर्श थे। उनके चिंतन के केंद्र में शिक्षा एंव स्त्रियों की दशा मौजूद थे। वे पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के अवाज थे। वे सामाजिक एंव धार्मिक सुधार आंदोलन के महान अग्रदूत राजा राम मोहन राय तथा दयानन्द सरस्वती के समकालीन थे।  जीवन परिचय      ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में 26 सितम्बर 1820 में  वीरसिंह गाँव, मेदनीपुर (पश्चिम बंगाल ) में  हुआ था। उनकी माता भगवती देवी, पिता ठाकुरदास बांधोपाध्याय, पत्नी दिनामनी देवी तथा एक मात्र पुत्र नारायण चंद्र बांधोपाध्यक्ष था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव से पुरी  कर 9 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आया था। वे इतने ...