स्मृतिशेष विश्वनाथ दास "देहाती"

सच्ची श्रद्धांजलि (स्मृतिशेष देहाती जी )
पथ पे चलना सिखा दिये वो, 
पर मंजिल  मिलनी बाकी है। 
जन चेतना को जगा गये वो, 
चिंता  साहित्य बचाने की है। 

रेणु  के थे वो  समकालीन, 
हो गये पंचतत्व में विलीन। 
समाज  के  कुरूतियों पर, 
रच  दिये थे वो "भिखारिन'। 

हमें प्रेरणा मिलती रहेगी सदा, 
पथ  पर चलेंगे, डरेंगे न ज़रा।  
रेणु  के  थे वास्तविक  वंशज, 
इतनी  सी बात तो जान ज़रा। 

युवाओं को उत्साहित करता,  
वो  नाती,अतुल 'अनजान'है। 
कोशी को साहित्य जगत में, 
दिलानी  और भी पहचान है। 

उनके साहित्य को पढ़कर, 
करले हम सब आत्मसात। 
यही सच्ची श्रद्धांजलि होंगी 
दिल कहता अब बारम्बार।

श्रवण कुमार पंडित (टेढ़ागाछ, बिहार )

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